09 February 2012

हड़ताल 10

कहकर कृपाल बाबू चले गये। प्रान बाबू सुन्न-से वहीं सिर पर दोनों हाथ रखे बैठे रहे।
रसोई उठा पत्नी दरवाज़े पर आयीं और उन्हें उस तरह बैठे हुए देखा, तो उन्होंने पूछा, ‘‘वहाँ क्यों बैठे हैं? कृपाल बाबू चले गये क्या?’’
उनसे कोई उत्तर न पा, पत्नी उनके पास आयीं और उनकी बाँह पकडक़र उन्हें उठाती हुई बोलीं, ‘‘क्या हुआ? कृपाल बाबू ने कुछ कहा है क्या? चलिए, अन्दर चलिए!’’
यह सहारा देकर उन्हें अन्दर ले आयीं और उन्हें उनकी जगह पर बैठा दिया।
दरवाज़ा बन्द करके वह लौटीं, तो प्रान बाबू लेट गये थे। वह उनसे कुछ पूछने को हुईं, लेकिन फिर यह सोचकर वह चुप रह गयीं कि यह आराम करने का समय है, सुबह देखा जाएगा। मच्छर भिन-भिना रहे थे, इसलिए उन्होंने उन्हें चादर ओढ़ा दी।
हमेशा की तरह सुबह चाय बनाकर पत्नी उन्हें जगाने आयीं। उन्होंने कई बार उन्हें पुकारा, लेकिन प्रान बाबू न तो सुगबुगाये और न ही उनमें कोई हरकत हुई। तब पत्नी ने चादर हटायी और उनकी नज़र प्रान बाबू की टँगी हुई आँखों पर पड़ी ही थी कि वह चीख मारकर गिर पड़ीं। प्रान बाबू मर गये थे।

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