09 February 2012

हड़ताल 6


‘‘यह झूठ है! बिल्कुल झूठ है!’’ प्रान बाबू मेज़ पर घूँसा मारकर कहते, ‘‘ऐसा नहीं हो सकता! हरगिज़ नहीं हो सकता! अफ़सरों ने यह अफ़वाह हमारे भ्रातृमण्डल में फूट डालने के लिए उड़ायी होगी। लेकिन इस अफ़वाह से हमारे यहाँ कोई भी धोखा खानेवाला नहीं है! हमारा भ्रातृमण्डल चट्टान की तरह ठोस और मजबूत है!’’
‘‘हो सकता है, आप ठीक कहते हों,’’ वह कहता, ‘‘मैंने तो जो बात सुनी है, कह दी है।’’
‘‘आप लोग ऐसी अफ़वाहों से गुमराह न हों!’’ प्रान बाबू तब और भी जोश में आकर कहते, ‘‘हमारे यहाँ हड़ताल शत-प्रति-शत सफल हुई हैै और सभी जगहों पर भी हड़ताल अवश्य सफल हुई होगी। जहाँ पुलिस के ज़ुल्म से हड़ताल पूरी तरह सफल न हुई हो, वहाँ भी हम हड़ताल को सफल ही मानेंगे। आज हमारे देश के बाबू वर्ग ने जिस अद्भुत साहस का प्रदर्शन किया है, वह हमारे देश के इतिहास में अभूतपूर्व है...और मैं कहता हूँ कि क्रान्ति अब दूर नहीं है। हमारे दु:खों का अन्त निकट है। ...हुँ:! सरकार सोचती थी कि वह हमें अध्यादेशों से डरा देगी! हमें देखना है कि अब वह कितने हज़ारों-लाखों कर्मचारियों के विरुद्घ कार्रवाई करती है? कैसे हमारी माँगों को स्वीकार नहीं करती? मैं कहता हूँ कि अगर अब भी सरकार के होश ठिकाने न आये, तो फिर वह हड़ताल होगी, वह हड़ताल होगी कि सरकार का तख़्ता उलट जाएगा...
उस दिन दोपहर से रात के आठ बजे तक कॉफ़ी हाउस में प्रान बाबू की यही वक्तृताएँ गूँजती रहीं। इस बीच कितने ही लोग आये और गये, लेकिन प्रान बाबू जमे रहे, जमे रहे और अपनी ख़ुशी, जोश और वक्तृताओं से लोगों को चकित करते रहे।
प्रान बाबू कॉफ़ी हाउस आने-जानेवालों की मँझली पीढ़ी के सदस्य थे। आज कोई विश्वास नहीं करेगा, लेकिन यह बिल्कुल सच है कि एक ज़माने में प्रान बाबू को लिखने-पढऩे का शौक था और इसी नाते वह बराबर, पेशे से एक क्लर्क होते हुए भी, कॉफ़ी हाउस आते थे और साहित्यकारों, पत्रकारों और विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसरों की मेज़ों पर बैठते थे। बहसों में अधिक हिस्सा न लेते हुए भी वह उनमें गहरी दिलचस्पी रखते थे और जो बात उन्हें कहनी होती थी, उसे बड़ी निर्भीकता से स्पष्ट शब्दों में कह देते थे। वह बड़े ही सीधे, नम्र और स्पष्ट वक्ता थे, इसी कारण लोग उन्हें, उनके क्लर्क होते हुए भी, अपनी मेज़ों पर नापसन्द न करते थे।
उनकी इस ख़ूबी के कारण ही कॉफ़ी हाउस के उनके सभी मित्रों को उनके विषय में सब-कुछ ज्ञात था। उन्हें यह ज्ञात था कि प्रान बाबू अपने पेशे में कोई तरक़्की इस कारण न कर पाये, क्योंकि वह अपने पेशे को निहायत कमीना पेशा मानते थे और हमेशा इस प्रयत्न में रहते थे कि साहित्य में कुछ जम जाएँ, तो इस पेशे को लात मार दें। उन्हें यह ज्ञात था कि प्रान बाबू साहित्य में इस कारण न जम सके, क्योंकि उन्हें अपने पेशे के कारण साहित्य में काम करने का अवकाश ही न मिलता था। उन्हें यह ज्ञात था कि इसी कशमकश के बीच, पन्द्रह-बीस वर्षों में उन्होंने पाँच लड़कियाँ और दो लडक़े पैदा कर लिये और बिल्कुल टूट गये। उन्हें यह ज्ञात था कि इस टूटन के बाद प्रान बाबू क्लर्की और साहित्य, दोनों को समान रूप से गालियाँ देने लगे और साहित्य को इसलिए छोड़ दिया, क्योंकि वह क्लर्की न छोड़ सके, क्योंकि उनके एक अदद बीवी और सात अदद बच्चे थे। उन्हें यह ज्ञात था कि प्रान बाबू के इस निर्णय के बाद उनके सामने केवल उनका जीवन-संघर्ष शेष रह गया और इस संघर्ष के लिए जिस शक्ति की आवश्यकता थी, उसे वे ठर्रे का सेवन करके प्राप्त करने लगे थे।

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