दौड़ाती। एक बजे के करीब प्रसाद घर आया। पद्मा ने साहस तो बहुत बटोरा था; पर प्रसाद के सामने जाते ही उसे इतनी कमजोरी मालूम हुई। फिर भी उसने जरा कड़े स्वर में पूछा, ‘आज इतनी रात तक कहाँ थे ? कुछ खबर है, कितनी रात गयी ? प्रसाद को वह इस वक्त असुन्दरता की मूर्ति-सी लगी। वह एक विद्यालय की छात्रा के साथ सिनेमा देखने गया था। बोला, ‘तुमको आराम से सो जाना चाहिए था। तुम जिस दशा में हो, उसमें तुम्हें, जहाँ तक हो सके, आराम से रहना चाहिए। पद्मा का साहस कुछ प्रबल हुआ, ‘तुमसे मैं जो पूछती हूँ, उसका जवाब दो। मुझे जहन्नुम में भेजो !’
'तो तुम भी मुझे जहन्नुम में जाने दो।'
'तुम मेरे साथ दगा कर रहे हो, यह मैं साफ देख रही हूँ।'
'तुम्हारी आँखों की ज्योति कुछ बढ़ गयी होगी !'
'मैं इधर कई दिन से तुम्हारा मिजाज कुछ बदला हुआ देख रही हूँ।'
'मैंने तुम्हारे साथ अपने को बेचा नहीं है। अगर तुम्हारा जी मुझसे भर गया हो, तो मैं आज जाने को तैयार हूँ।'
'तुम जाने की धामकी क्यों देते हो ! यहाँ तुमने आकर कोई बड़ा त्याग नहीं किया है।'
'मैंने त्याग नहीं किया है ? तुम यह कहने का साहस कर रही हो ?
‘मैं देखता हूँ, तुम्हारा मिजाज बिगड़ रहा है। तुम समझती हो, मैंने इसे अपंग कर दिया। मगर मैं इसी वक्त तुम्हें ठोकर मारने को तैयार हूँ, इसी वक्त, इसी वक्त !' पद्मा का साहस जैसे बुझ गया था। प्रसाद अपना ट्रंक सँभाल रहा था। पद्मा ने दीन-भाव से कहा, ‘मैंने तो ऐसी कोई बात नहीं कही, जो तुम इतना बिगड़ उठे। मैं तो केवल तुमसे पूछ रही थी, कहाँ थे। क्या मुझे
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