'तो मैं भी करूँगा।'
'मगर इस एक बात के सिवा मैं और सभी बातों में स्वतंत्र रहूँगी !'
'और मैं भी इस एक बात के सिवा हर बात में स्वतंत्र रहूँगा।'
'मंजूर।'
'मंजूर !'
'तो कब से ?'
'जब से तुम कहो।'
'मैं तो कहती हूँ, कल ही से।'
'तय। लेकिन अगर तुमने इसके विरुद्ध आचरण किया तो ?'
'और तुमने किया तो ?'
'तुम मुझे घर से निकाल सकती हो; लेकिन मैं तुम्हें क्या सजा दूंगा ?'
'तुम मुझे त्याग देना, और क्या करोगे ?'
'जी नहीं, तब इतने से चित्त को शान्ति न मिलेगी। तब मैं चाहूँगा तुम्हें जलील करना; बल्कि तुम्हारी हत्या करना।'
'तुम बड़े निर्दयी हो, प्रसाद ?'
'जब तक हम दोनों स्वाधीन हैं, हमें किसी को कुछ कहने का हक नहीं, लेकिन एक बार प्रतिज्ञा में बँध जाने के बाद फिर न मैं उसकी अवज्ञा सह सकूँगा, न तुम सह सकोगी। तुम्हारे पास दण्ड का साधन है, मेरे पास
नहीं है। कानून मुझे कोई भी अधिकार नहीं देगा। मैं तो केवल अपने पशुबल से प्रतिज्ञा का पालन कराऊँगा और तुम्हारे इतने नौकरों के सामने मैं अकेला क्या कर सकूँगा ?'
'तुम तो चित्र का श्याम पक्ष ही देखते हो ! जब मैं तुम्हारी हो रही हूँ, तो यह मकान, नौकर-चाकर और जायदाद सबकुछ तुम्हारा है। हम-तुम
No comments:
Post a Comment