‘‘ग़द्दार कहाँ नहीं हैं?’’ प्रान बाबू नाक चढ़ाकर फट पड़ते, ‘‘लेकिन हमें देखकर ग़द्दारों का साहस छूट गया। वे भाग खड़े हुए और हमारे यहाँ मुक्कमल हड़ताल हो गयी!’’
‘‘हमने तो सुना है कि आपके कार्यालय पर पुलिस ने बड़ी गिरफ़्तारियाँ की हैं,’’—कोई कहता।
‘‘हाँ,’’ प्रान बाबू तपाक से कहते—‘‘काफ़ी गिरफ़्तारियाँ हुई हैं। हमारे भ्रातृमण्डल के प्राय: सभी नेता गिरफ़्तार कर लिये गये हैं। अफ़सरों ने खुद दौड़-दौडक़र नेताओं को पहचनवाया और पुलिस से गिरफ़्तार करवाया है। लेकिन इससे क्या? हड़ताल हमारे यहाँ मुकम्मल है। कोई भी कार्यालय नहीं गया, इतना मैं ताल ठोंककर कहता हूँ! अब आप अपने कार्यालय का हाल बताइए?’’
‘‘इनके यहाँ तो हड़ताल आंशिक ही मालूम होती है,’’ कोई उनकी ओर से आँखे बचाकर बताता।
‘‘क्यों?’’ प्रान बाबू जैसे बिगडक़र पूछते, ‘‘ऐसा क्यों हुआ? आप लोगों ने ग़द्दारों को कार्यालय में क्यों घुसने दिया?’’
‘‘उन्हें पुलिस की सुरक्षा प्राप्त थी,’’—वह बताता, ‘‘इन लोगों ने ग़द्दारों को रोकने की कोशिश की, तो पुलिस ने गोलियाँ चला दीं।’’
‘‘गोलियाँ चला दीं?’’ प्रान बाबू जैसे आँखें बाहर निकाल-निकालकर पूछते।
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