‘‘आपको नहीं मालूम?’’ वह बताता, ‘‘शायद एक-दो आदमी मरे भी हैं, घायल तो कई हुए हैं।’’
‘‘और आप लोग यहाँ...बड़े अफ़सोस की बात है!’’ और प्रान बाबू ललकारकर कहते, ‘‘पुलिस ने अगर हमारे यहाँ गोलियाँ चलायी होतीं, तो हम...हम...अब हम आपको क्या बताएँ!’’
‘‘आप लोगों का भ्रातृमण्डल बहुत ही शक्तिशाली है,’’ वह बेचारा जैसे शर्मिन्दा होकर कहता।
‘‘लेकिन,’’ तभी कोई दूसरा कह पड़ता, ‘‘हमने तो सुना है कि इनके यहाँ कितने ही लोग छुपकर अपनी हाजि़री के दस्तखत बना रहे हैं और रात तक रजिस्टर खुला रहेगा, ताकि लोग आयें और अपनी हाजि़री के दस्तख़ त बना जायें।’’
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