इधर बहुत दिनों से प्रान बाबू कॉफ़ी हाउस तो आते थे, लेकिन काफ़ी न पीते थे। कोई पूछता, तो अजीब-सा दयनीय मुँह बनाकर वह कह देते, ‘‘धन्यवाद! मन नहीं कर रहा है।’’ किन्तु आज कोई पूछता, तो वह झट बड़े उत्साह के साथ हँसते हुए कहते—‘‘क्यों न पीऊँगा? ज़रूर पीऊँगा! मँगाइए! हो, तो एक सिगरेट भी दीजिए!’’
कदाचित् उनकी ख़ुशी और जोश का मज़ा लेने के लिए ही हैरत में पड़े हुए कई लोग एक साथ ही उनकी ओर अपना-अपना पैकेट बढ़ा देते। तब प्रान बाबू एक के पैकेट से एक सिगरेट निकालते हुए दूसरों को आश्वस्त करने की ग़रज़ से कहते, ‘‘इनकी पी लूँ, फिर आप लोगों की भी पीऊँगा! धन्यवाद! धन्यवाद!’’
और सिगरेट जलाकर इतने ज़ोर से कश लेने लगते, जैसे वह सिगरेट नहीं, गाँजे का दम लगा रहे हों। पाँच-सात कश में ही वह एक सिगरेट ख़ त्म कर दूसरी जला लेते। यही हाल कॉफ़ी का भी था। कॉफ़ी आते ही वह उठा लेते और उसे ऐसे ग़टक जाते, जैसे वह गर्म काफ़ी न होकर ठण्डा पानी हो। वह आज कितनी बार कॉफ़ी ग़टक चुके थे और कितनी सिगरेटें फूँक चुके थे, इसका कोई हिसाब नहीं था।
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