09 February 2012

हड़ताल 9

प्रान बाबू ने दरवाज़ा खोला और एकदम उनसे लिपट गये, तो उनकी हालत ख़ राब हो उठी। हकलाते हुए वह बोले, ‘‘क्या बात है, प्रान बाबू, क्या बात है? आप...’’
‘‘अरे भाई!’’ उनसे लिपटे हुए ही हँसते हुए प्रान बाबू बोले, ‘‘बधाई! बधाई! हमारी हड़ताल शत-प्रतिशत सफल रही!’’
‘‘नहीं, प्रान बाबू,’’ जैसे रोकर कृपाल बाबू बोले, ‘‘हमारी हड़ताल...’’
उन्हें छोडक़र प्रान बाबू अचकचा कर बोले, ‘‘क्या कहते हो, कृपाल बाबू, सुबह हमने अपनी आँखों से ही...’’
‘‘सुबह की बात ठीक है,’’ कृपाल बाबू ने मुँह लटकाकर कहा, ‘‘लेकिन, भाई, बाद में लोग छुपकर रजिस्टर पर अपनी हाजि़री के दस्तख़ त बना आये हैं। इस समय भी दस्तख़ त बन रहे हैं। मुझे तो शाम को शंकर बाबू ने बताया कि ऐसा हो रहा है। मैंने जाकर देखा, तो शंकर बाबू की बात ठीक निकली। क्या करता, मैं भी दस्तख़ त बनाकर अभी लौटा हूँ, भाई! सोचा, पता नहीं, तुमको मालूम है कि नहीं, सो चला आया तुम्हें बताने। साहब कहते थे, रात-भर दस्तख़ त बनेंगे। भाई, तुम भी जाकर बना आओ!’’
सुनकर प्रान बाबू के दिल की धडक़न ही जैसे बन्द हो गयी। उन्हें लगा कि अभी बैठ न गये, तो गिर पड़ेंगे। वह माथे पर हाथ रखकर वहीं बैठ गये।
‘‘भाई, मुझे भी बड़ा अफ़सोस है,’’ कृपाल बाबू ने उन्हें समझाते हुए कहा, ‘‘लेकिन किया ही क्या जा सकता है? जाओ, फ़िलहाल दस्तख़ त बना आओ, फिर देखेंगे...ठीक है न?’’
प्रान बाबू को जैसे कुछ भी सुनाई न दिया। वह जवाब क्या देते?
‘‘मैंने अभी खाना नहीं खाया है, बच्चे इन्तज़ार कर रहे हैं। तो मैं चलूँ न?’’ —कृपाल बाबू ने उन पर झुककर पूछा।
फिर भी प्रान बाबू कुछ न बोले, तो वह सीधे होकर बोले, ‘‘सोच लो, भाई! लेकिन मैं तो यही कहूँगा कि अब ख़ामखाह के लिए सिर कटाने से कोई फ़ायदा न होगा!’’

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