उसने घूमकर देखा। एक पारसी अपने सोए हुए बच्चे को कन्धे से लगाये खड़ा था और उसे हाथ के इशारे से बुला रहा था। उसने होंठ गोल करके एक बार पारसी की तरफ़ देख लिया, फिर खेल देखने में व्यस्त हो गया।
“ए लडक़े, इधर आ,” पारसी ने फिर आवाज़ दी, “इस बच्चे को उठाकर सीतल बाग़ तक ले चल। एक आना मिलेगा।”
“ख़ाली नहीं है,” लडक़े ने सिर और हाथ हिलाकर मना कर दिया।
“साले का दिमाग़ तो देखो,” पारसी बड़बड़ाया, “ख़ाली नहीं है।...चल, आ इधर, दो आना मिलेगा।”
“ख़ाली नहीं है,” लडक़े ने और भी बेरुखी के साथ कहा, और जेब से एक सीपी निकालकर उसे हवा में उछाला और दबोच लिया।
“साला बदमाश है,” पारसी ने अपनी पत्नी से, जो गरदन एक तरफ़ को झुकाए ढीले-ढाले ढंग से खड़ी थी, कहा। फिर बच्चे को उठाये वह सडक़ की तरफ़ चल दिया।
गेंद उछालने की प्रतियोगिता समाप्त हो गयी थी। वह लडक़ी अब अकेली ही बाँह घुमा-घुमाकर गेंद को पीछे की तरफ़ उछाल रही थी। एक बार बाँह घुमाने में गेंद ज़्यादा घूम गयी और तेज़ी से समुद्र की तरफ़ बढ़ चली। लडक़ी के मुँह से हल्की-सी ‘ओह’ निकली। तभी वह लडक़ा तेज़ी से गेंद के पीछे भाग खड़ा हुआ। इससे पहले कि गेंद सामने से आती लहर की लपट में चली जाती, उसने टखने-टखने पानी में जाकर उसे पकड़ लिया—हालाँकि अँधेरा इतना हो चुका था कि गेंद और पत्थर में फर्क़ कर पाना मुश्किल था। लडक़ा गीली गेंद को ज़रा-ज़रा उछालता हुआ, उन लोगों के पास ले आया।
“बड़ी तेज़ आँख है तेरी!” भारी गरदन वाले अधेड़ व्यक्ति ने, जो उस परिवार का पिता था, गेंद उसके हाथ से लेते हुए गिलगिली हँसी के साथ कहा।
“किस तरह चिमगादड़ की तरह लपका था!” नीले दोपट्टे वाली लडक़ी बोली। इन बातों के उत्तर में लडक़े के गले से सिर्फ़ ख़ुश्क-सी हँसी का स्वर सुनाई दिया।
“चल, हमारा सामान उठाकर ले चल,” सूखी हड्डियों वाली स्त्री, जो शायद उस लडक़ी की माँ थी, अहसास जताती हुई बोली।
“चलेगा?” पुरुष ने उसे ख़ामोश देखकर झिडक़ने के स्वर में पूछ लिया।
“चलेगा,” लडक़े ने उत्तर दिया।
“तो यह दरी तह कर ले और बाकी सामान समेटकर टोकरी में रख ले,” उस व्यक्ति ने दरी पर रखी प्लेटों और चम्मचों की तरफ़ इशारा किया।
लडक़े ने एक झिझक के साथ बिखरे हुए सामान को देखा, एक निगाह लडक़ी पर डाली, और झुककर वे चीज़ें इकट्ठी करने लगा।
“सब चीज़ें ठीक से रख, और जा, पहले प्लेटें और चम्मच धो ला,” स्त्री ने उसे आदेश दिया।
उसने जूठी प्लेटें और चम्मच इकट्ठी कीं और समुद्र की तरफ़ चला गया। वहाँ उसने उन सबको रेत से मलकर साफ़ किया और अच्छी तरह अपनी कमीज़ से पोंछ लिया। एक पलेट लोटती लहर के साथ बह चली, तो उसने झपटकर उसे पकड़ लिया, और फिर से साफ़ करने लगा। जब उसे तसल्ली हो गयी कि सब चीज़ें ठीक से चमक गयी हैं, तो वह सीटी बजाता हुआ उन्हें उन लोगों के पास ले आया।
“इतनी देर क्या करता रहा वहाँ?” स्त्री ने आते ही उसे झिडक़ दिया, “हम लेाग रात तक यहीं बैठे रहेंगे क्या? अब जल्दी कर!”
वह बैठकर प्लेटों को टोकरी में रखने लगा। स्त्री बिलकुल उसके पास आकर खड़ी हो गयी, और बोली, “सब चीज़ें गिनकर रखना। प्लेटें पूरी छ: हैं न?
लडक़े ने प्लेटें गिनीं और सिर हिलाया।
“और चम्मच?” स्त्री झुककर देखती हुई बोली, “चम्मच तो मुझे पाँच नज़र आ रही हैं।”
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