इधर बहुत दिनों से उन्होंने जैसे अपना मुँह सी रखा था। कभी किसी ने औपचारिकतावश कुशल-समाचार पूछ ही लिया, तो वह जैसे बड़ी मुश्किल से अपने मुँह का एक टाँका खोलते और सिर झुकाये हुए ही भुन-से ‘ठीक है’ कहकर तुरन्त अपने मुँह का टाँका दुरुस्त कर लेते। इसी कारण कदाचित् लोग उन पर दया करते और उनसे कोई बात न करते। लेकिन आज वह मेज़ पर आते ही लोगों की ओर हाथ बढ़ाते हुए मुँह फाडक़र बोल पड़ते, ‘‘हमारे कार्यालय में तो मुकम्मल हड़ताल हो गयी!’’
लोग हैरत से उनका मुँह ताकने लगते, तो वह हँसकर कहते, ‘‘आप लोग मेरा मुँह क्या ताक रहे हैं? मैं पक्की बात कह रहा हूँ! अपनी आँखों से ही देखकर आया हूँ!’’
‘‘तो आप अपने कार्यालय गये थे?’’—कोई पूछ लेता।
‘‘गया नहीं था, तो क्या मैं कोई झूठ बोल रहा हूँ?’’—बड़ी दबंगई से वह जवाब देते।
‘‘नहीं-नहीं,’’ कोई बात को सँभालता, ‘‘इनका मतलब यह था कि जब हड़ताल में शामिल होना ही था, तो आपको अपने कार्यालय जाने की क्या ज़रूरत थी?’’
‘‘थी क्यों नहीं?’’ पटाखे की-सी आवाज़ में प्रान बाबू बोल पड़ते, ‘‘ज़रूरत क्यों नहीं थी? हम लोग न जाते, तो ग़द्दारों का मुँह काला कौन करता?’’
‘‘अच्छा-अच्छा! तो आपके कार्यालय में भी ग़द्दार हैं क्या?’’ कोई पूछ बैठता।
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