पत्नी ने ज़बरदस्ती अपने को छुड़ाते हुए कहा, ‘‘छोडि़ए, यह क्या कर रहे हैं आप!’’
लेकिन प्रान बाबू ने उन्हें न छोड़ा। वह उन्हें बेतहाशा चूमने लगे।
‘‘बच्चे अभी सोये है...जाग जाएँगे...,’’ हताश पत्नी ने कहा, ‘‘छोडि़ए, मैं दरवाज़ा बन्द करूँ।’’
उन्हें छोडक़र प्रान बाबू कमरे में आ गये। कमरे में फ़र्श पर सातों लडक़े-लड़कियाँ एक क़तार में सोये हुए थे। प्रान बाबू ने एक-एक कर उन्हें बड़े ध्यान से देखा और फिर उनके सिरहाने बैठकर एक-एककर उनका सिर सहलाने लगे।
दरवाज़ा बन्द कर पत्नी कमरे में आयीं, तो उन्हें लडक़े-लड़कियों का सिर सहलाते हुए देखकर बोलीं, ‘‘यह आप क्या कर रहे है? उन्हें छोड़ दीजिए, वे जाग जाएँगे। जल्दी हाथ-मुँह धोकर खाना खा लीजिए, तो मैं भी खा-पीकर आराम करूँ। दिन-भर की थकी-हारी हूँ। आज हड़ताल थी, फिर भी आपसे न हुआ कि जल्दी घर आ जाएँ।’’
‘‘मैं खाना नहीं खाऊँगा,’’ पत्नी की ओर मुसकराकर देखते हुए प्रान बाबू बोले, ‘‘आज मैंने कई कप कॉफी पी है, बहुत-कुछ खाया भी है। पेट भरा हुआ है।’’
‘‘आपने कहाँ से खाया-पिया?’’ विश्वास न करके पत्नी ने पूछा, ‘‘आपके पास पैसा तो था नहीं!’’
हँसकर प्रान बाबू बोले, ‘‘लोगों ने खिला-पिला दिया, दया की माँ, माने ही नहीं,’’ उन्होंने कहा, ‘‘तुम जाओ, खा-पी लो।’’
‘‘झूठ तो नहीं कह रहे हैं न?’’ पत्नी ने फिर विश्वास न करके कहा, ‘‘खाना है, उठकर खा लीजिए!’’
‘‘नहीं, भाई, झूठ क्यों कहूँगा?’’ जेब से कुछ पैसे निकालकर पत्नी की ओर बढ़ाते हुए प्रान बाबू बोले, ‘‘ये पैसे रख लो, आज मैंने गोला भी नहीं लिया! ज़रूरत ही नहीं पड़ी...! इस तरह क्या देख रही हो? जल्दी खा-पी लो! अब मैं आराम करूँगा।’’
पत्नी रसोई की ओर चली गयीं, तो प्रान बाबू अपने उन्हीं कपड़ों में एक किनारे सबसे छोटे बच्चे के पास लेट गये और उसकी देह पर धीरे-धीरे हाथ फेरने लगे। अब वह चाहते थे कि उनका मन स्थिर हो जाए और वह सो जाएँ। उन्होंने कोशिश भी की, लेकिन उनका मन स्थिर न हो रहा था। उन्होंने सोचा कि अगर मैं किसी काम में अपने मन को लगाऊँ, तो शायद वह स्थिर हो जाएगा। लेकिन इस समय वहाँ कौन-सा काम रखा हुआ था? वह सोचते हुए उठे और सबसे बड़े लडक़े दयानन्द के पास, जो दूसरे किनारे सोया पड़ा था, गये। उसके सिरहाने कई किताबें और कापियाँ बेतरतीब पड़ी हुई थीं। वह किताबें और कापियाँ तरतीब से रखने लगे। तभी उनकी दृष्टि एक जासूसी उपन्यास पर पड़ी। वह उसे हाथ में लेकर देखने लगे। उन्हें ग़ुस्सा आया कि लौंडा फिर जासूसी उपन्यासों में पैसा और समय बरबाद करने लगा! इसी के लिए उन्होंने कितनी बार लौंडे को डाँटा और पीटा था! लेकिन आज उनका यह ग़ुस्सा क्षणिक ही रहा। बल्कि उन्होंने एक अजीब सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि से लौंडे को देखा और उपन्यास हाथ में लिये ही अपनी जगह पर आ लेटे।
वह उपन्यास खोलकर पढऩा शुरू करने वाले ही थे कि दरवाज़े से पड़ोस के कृपाल बाबू की पुकार सुनाई पड़ी, ‘‘प्रान बाबू! प्रान बाबू! प्रान बाबू, हो क्या?’’
‘‘हाँ-हाँ, कृपाल बाबू! मैं हूँ, भाई, हूँ! रुको, दरवाज़ा खोलता हूँ!’’ बड़े उत्साह के साथ उठते हुए प्रान बाबू ने ललकार कर आवाज़ दी।
उनकी इस समय ऐसी ललकार-भरी आवाज़ सुनकर कृपाल बाबू चौंक उठे। उनका तो ख़ याल था कि इस समय प्रान बाबू गोले के प्रभाव से होश-हवास खोये हुए पड़े होंगे।
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