पचास गज़ दूर से समुद्र की उमड़ती लहरों का शब्द सुनाई दे रहा था। वह कुछ देर लहरों को किनारे की तरफ़ आते, और एक फ़ेनिल लकीर छोडक़र वापस जाते देखता रहा। हर लहर के बाद दूसरी लहर और आगे तक बढ़ आती थी। पच्छिमी क्षितिज के पास बादलों के दो लम्बे सुरमई टुकड़े, समुद्र से निकले बड़े-बड़े मगरमच्छों की तरह, एक-दूसरे से उलझे हुए थे। लडक़ा उन मगरमचछों को एक-दूसरे में विलीन होते देखता रहा। फिर वह बैठकर रेत में से सीपियाँ बटोरने लगा। केकड़े और उसी तरह के दूसरे जन्तु उछलते हुए समुद्र की तरफ़ से आते थे और पास से निकल जाते। लडक़ा टूटी हुई सीपियों को दूर फेंक देता, और साबुत सीपियों में से जो उसे खूबसूरत लगतीं उन्हें कमीज़ से साफ़ करके जेब में डाल लेता। अँधेरा धीरे-धीरे गहरा हो रहा था, इसलिए सीपियाँ ढूँढऩा कठिन हो रहा था। लडक़ा एक बड़ी-सी सुन्दर सीपी को, जो एक ओर से टूटी हुई थी, हाथ में लेकर अनिश्चित दृष्टि से देखता रहा कि उसे जेब में रख लेना चाहिए या नहीं? पर उसकी आँख ने टूटी हुई सीपी को स्वीकार नहीं किया। उसने उसे वहीं रेत में रख दिया और उठ खड़ा हुआ। उसकी आँखें कई पल गरजती हुई लहरों पर टिकी रहीं, फिर उधर को मुड़ गयीं जिधर चौराहे की बत्ती का रंग लाल से पीला और पीले से हरा हो रहा था, और लाल रंग की बसें घरघराती हुई एक-दूसरी के पीछे दौड़ रही थीं।
एक बच्चा अपनी माँ की उँगली पकड़े नाचता हुआ आ रहा था। यह उसकी तरफ़ देखकर मुस्कराया। एक गुब्बारेवाले के पास से निकलते हुए उसने उसके गुब्बारों को छेड़ दिया। गुब्बारेवाले ने घूरकर गुस्से से उसे देखा, तो उसने उसकी तरफ़ मुँह करके ज़ोर की सीटी बजाई और हाथ से जेब में भरी हुई सीपियों का वज़न और फैलाव महसूस करता हुआ, तेज़-तेज़ चलने लगा।
सडक़ के उस पार, चरनी रोड स्टेशन पर, एक लोकल गाड़ी मैरीन लाइंज से आकर रुकी थी, जो सीटी देकर अब ग्रांट रोड की तरफ़ चल दी। कुछ ही देर में गाड़ी से उतरे हुए लोगों की भीड़ चरनी रोड के पुल पर आ गयी। भइया लोग दूध बेचकर खाली पीपे लिये आ रहे थे। कुछ घाटी युवतियाँ एक-दूसरी को छेड़ती हुई पुल की सीढ़ियाँ उतर रही थीं। लडक़े की आँखें काफी देर पुल के उस हिस्से पर लगी रहीं, जहाँ से हर पल नए-नए चेहरे प्रकट होकर पास आने लगते थे, और कुछ ही देर में सीढिय़ों से उतरकर अदृश्य हो जाते थे।
“खिप्खिप्-खिर्र्र्,” लडक़े ने मुँह में दो उँगलियाँ डालकर आवाज़ पैदा की और मुस्कराकर चारों तरफ़ देखा कि लोगों पर उस आवाज़ की क्या प्रतिक्रिया हुई है। यह देखकर कि उसकी आवाज़ की तरफ़ किसी का ध्यान नहीं गया, उसने बाँहें फैला लीं और तनकर चलने लगा। काले पत्थरे के बुत के पास पहुँचकर उसने उसकी दो परिक्रमाएँ लीं, और भागता हुआ वहाँ पहुँच गया जहाँ एक परिवार के छ:-सात लोगों में एक गेंद को ऊँची से ऊँची उछालने की प्रतियोगिता चल रही थी। वह अपने रूखे बालों को खुजलाता और बीच-बीच में बायीं पिंडली को दायें पैर से मलता हुआ, उनका खेल देखने लगा। एक पन्द्रह-सोलह साल की लडक़ी, जिसने अपना नीला दोपट्टा कसकर कमर से लपेट रखा था, गेंद के साथ ऊपर को उछलती, तो लडक़े की एडिय़ाँ भी ज़मीन से तीन-चार इंच ऊपर उठ जातीं।
“ए लडक़े!” किसी ने पास से उसे आवाज़ दी।
No comments:
Post a Comment