उन्हें यह भी ज्ञात था कि जब ठर्रे का परिणाम बहुत बढ़ जाने से प्रान बाबू के घर की विपन्नता बहुत अधिक बढ़ गयी, तो उन्होंने ठर्रे को लात मारी और भंग के गोले का सेवन करने लगे—सस्ता और बालानशीं! उन्हें यह ज्ञात था कि इस स्थिति को पहुँचते-पहुँचते प्रान बाबू पक्के औलिया बन गये, उन्हें न तो अपने तन की सुध रही, न मन की, न कपड़े की, न जूते की, न घर की, न मित्रों की। उन्होंने अपने मुँह को सी लिया और कॉफ़ी पीना बन्द कर दिया, सिगरेट पीना बन्द कर दिया, क्योंकि अब नशे के राजा से उनकी दोस्ती हो गयी थी। उन्हें यह ज्ञात था कि फिर भी प्रान बाबू ने कॉफ़ी हाउस आना बन्द न किया। लेकिन उन्हें यह एक बात ज्ञात न हो सकी कि इस स्थिति में भी प्रान बाबू ने कॉफ़ी हाउस आना क्यों बन्द न किया था, क्यों अब उन्होंने अपने मुँह को सी लिया था, क्यों अब वह कुछ बोलते ही न थे।
ऐसे प्रान बाबू सबको चकित करके जब कॉफी हाउस से निकलकर बाहर आये, तो स्वभावत: उनकी चाल में भी अन्तर आ ही गया था। और दिनों की तरह डगमगाते हुए चलने की जगह आज वह बिल्कुल ठीक तरह चल रहे थे और तेज भी चल रहे थे। उनकी कुछ झुकी हुई पीठ आज सीधी दिखाई दे रही थी। गढ़ों में डूबी गीली-गीली आँखों की मुँदी-मुँदी-सी रहने वाली पलकें आज पूरी तरह खुली हुई थीं। उनका ठिगना क़द लम्बा-सा दिखाई दे रहा था। सिले हुए-से रहने वाले होंठ आज कुछ खुले-खुले थे और उन पर मुसकराहट भी आ-जा रही थी और वे हिल भी रहे थे। पहले सडक़ पर चलते समय वह इधर-उधर बिल्कुल न देखते थे, लेकिन आज वह जान-बूझकर अपने चारों ओर देखते हुए चल रहे थे और कोई परिचित दिखाई पड़ जाता था, तो दौडक़र उससे हाथ मिलाते थे और हड़ताल की बात करते थे, किसी-किसी के तो वह गले भी लिपट जाते थे।
यों मिलते-मिलाते प्रान बाबू बाज़ार से आगे निकल आये तो अचानक ही सुनसान, अँधेरी-सी सडक़ पर उन्हें एक धक्का-सा लगा और उन्हें अब जाकर याद आया कि आज शाम को मैंने गोला तो लिया ही नहीं! यह याद आना था कि उनके पाँव भंग की दुकान की ओर मुड़ गये। लेकिन ज़रा दूर जाकर वह ठिठक गये और कुछ सोचने लगे। उन्हें अचानक ही यह ख़ याल आया कि गोला लेने के बाद न तो मैं किसी से ठीक तरह मिल सकूँगा और न बातें ही कर सकूँगा। अभी तो मुझे अपनी बीवी से मिलना है, बच्चों से मिलना है और उनके साथ बातें करनी हैं। फिर आज गोले की ज़रूरत भी क्या है? आज तो अपने-ही-आप मन मौज में है। और उन्होंने पलटकर अपने घर की सडक़ पकड़ ली।
दो मील पैदल चलकर वह अपने घर पहुँचे थे, लेकिन उन्हें थकावट बिल्कुल न थी। उनके जोश और ख़ुशी में कोई भी कमी न आयी थी। उन्होंने पहले की तरह बेजान-से हाथों से बन्द दरवाज़े की जंजीर न बजायी बल्कि जानदार हाथों से जंजीर इतने ज़ोर से बजायी कि अन्दर उनकी पत्नी चौंक उठीं और उन्होंने पुकारकर कहा, ‘‘कौन है? बाबूजी घर पर नहीं हैं!’’
‘‘अरे भाई, दरवाज़ा खोलो!’’ —खनकती हुई-सी आवाज़ में मुसकराते हुए प्रान बाबू बोले, ‘‘मैं हूँ! दया का बाबूजी!’’
यह दया के बाबूजी ही हैं, पत्नी को आश्वस्त हो जाना चाहिए था, किन्तु ऐसा न हुआ। वह और भी चौंक उठीं। उनका माथा ठनक गया। आज यह कैसी आवाज़ है दया के बाबूजी की! कभी उनकी ऐसी आवाज़ थी, अब तो उन्हें यह भी याद न था।
उन्होंने मन-ही-मन परेशानी का अनुभव करते हुए दरवाज़ा खोला ही था कि प्रान बाबू ने उन्हें अपने अंक में भर लिया और हँसते हुए बोले, ‘‘जानेमन! हमारी हड़ताल सफल हो गयी है! अब तुम कोई चिन्ता मत करो! हमें जल्दी ही हमारी आवश्यकता के अनुकूल वेतन मिलेगा! हमें अब कोई तंगी न रहेगी!’’
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