भैरव प्रशाद गुप्त की कहानी "हड़ताल"
प्रान बाबू उस समय इतने जोश और ख़ुशी में थे कि उन्हें देखकर सभी लोग चकित थे, लोग उनकी हर हरकत और हर बात को चकित हो-होकर देख-सुन रहे थे। किन्तु प्रान बाबू को अपनी अस्वाभाविक हरकतों और बातों का जैसे कोई होश ही न था। वह तो अपनी ही ख़ुशी और जोश में मस्त थे। उनकी कमजोर टाँगों में जाने कहाँ की ताक़त आ गयी थी कि वह तनिक-तनिक देर में इस मेज़ से उस मेज़ और उस मेज से उस मेज़ पर तुल-तुल चलकर पहुँच जाते। बड़ी गर्मजोशी के साथ मेज़ पर बैठे हुए लोगों से हाथ मिलाते और अपनी बात शुरू कर देते। उनकी गूँगी ज़बान आज जैसे कैंची की तरह चल रही थी। उनके सूखे चेहरे पर एक अजीब रौनक़ थी और उनकी निस्तेज, गढ़ों में धँसी हुई नम आँखों में एक अजीब चमक थी।
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